ओखला, भलस्वा और गाजीपुर लैंडफिल साइट पर कूड़े के पहाड़ को खत्म करना दिल्ली सरकार और एमसीडी के लिए बड़ी चुनौती है। निगम की सत्ता में बीजेपी के लिए विकसित और स्वच्छ दिल्ली बनाने की तरफ नई सरकार चल पड़ी है। लिहाजा वेस्ट एनर्जी प्लांट लगाने के साथ ही अब इनर्ट को लेकर एक बडा फैसला दिल्ली नगर निगम ने ले लिया है।
लैंडफिल साइटों पर ट्रामेल मशीने सालों से पड़े लेगेसी वेस्ट यानि कचरे को छानती हैं जिसमें ईंट-पत्थर, प्लास्टिक और मिट्टी अलग की जाती है। कचरे के छानने के बाद जो मिट्टीनुमा सामग्री होती है वही इनर्ट कहलाती है। सूखे कचरे से ज्यादा और गीले कचरे से कम इनर्ट निकलती है। इसे प्योर खाद भी कह देते हैं।
दिल्ली नगर निगम ने इनर्ट निस्तारण के नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए इसकी खपत सीमा को 25 किलोमीटर से बढ़ाकर 70 किलोमीटर करने की योजना बनाई है। यह कदम राजधानी में लैंडफिल रिक्लेमेशन और शहरी विकास को गति देने के उद्देश्य से उठाया गया है।
पूर्व में निगम तीन भागों में विभाजित था, जिससे इनर्ट खपत की सीमा 25 किलोमीटर तक सीमित थी। लेकिन अब निगम एकीकृत है और राजधानी के हर कोने तक इनर्ट पहुंचाने की योजना बनाई जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि यूईआर-2 के बाद फिलहाल कोई बड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना नहीं है, इसलिए इनर्ट को खपाने के लिए नए विकल्पों की तलाश जरूरी है।
कहां से कितना इनर्ट निकलता है?
दिल्ली के तीन प्रमुख लैंडफिल साइटों—गाजीपुर, ओखला और भलस्वा—से निकलने वाले इनर्ट की मात्रा इस प्रकार है:
- गाजीपुर: 65–70%
- ओखला: 70–75%
- भलस्वा: 55–65%
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि इनर्ट की मात्रा कचरे की प्रकृति पर निर्भर करती है—सूखे कचरे से अधिक इनर्ट निकलता है, जबकि गीले कचरे से कम।
इनर्ट का उपयोग कहां-कहां
इनर्ट का सफलतापूर्वक उपयोग दिल्ली–मेरठ एक्सप्रेसवे, यूईआर-2, ईको पार्क और रोहिणी की डीडीए भूमि पर किया जा चुका है। इसका उपयोग गड्ढों को भरने, सड़क निर्माण की बेस लेयर, और जैविक अपशिष्ट के साथ मिलाकर पार्कों में खाद के रूप में भी किया जा सकता है।
इनर्ट की आपूर्ति का लेखा-जोखा
यह तालिका दर्शाती है कि दिल्ली के लैंडफिल स्थलों से निकला इनर्ट किस तरह राष्ट्रीय परियोजनाओं और स्थानीय विकास में खपाया गया है।
इनर्ट से विकास की नई राह
यदि सही ढंग से प्रबंधित किया जाए, तो इनर्ट न केवल लैंडफिल को कम करने में मदद करता है, बल्कि दिल्ली को एक स्वच्छ, हरित और टिकाऊ शहर बनाने की दिशा में भी अहम भूमिका निभाता है।

