साल 2016 की दिवाली के बाद हवा न केवल जहरीली हो गई बल्कि कई दिनों तक स्मॉग की परत छाई रही। सांसों का आपातकाल देखते हुए सुप्रीम कोर्ट अक्टूबर 2017 में पटाखों की बिक्री और भंडारण पर प्रतिबंध लगाया और तभी से दिल्ली-एनसीआर में ये जारी है। वक्त बदला साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने तय स्थानों पर ग्रीन पटाखे जलान की अनुमति दे दी। लेकिन बाद में ग्रीन पटाखों पर भी बैन लग गया अब सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा आदेश के बाद MCD और NDMC साल 2018 की तरह ही तय स्थानों का चुनाव करेंगे जहां पर ग्रीन पटाखे फोड़े जा सकते हैं।
1054 स्थान चुने थे : सामुदायिक भवन और पार्क बनेंगे केंद्र!
- एमसीडी (MCD) ने लगभग 1000 स्थानों को चिन्हित किया था जहाँ ग्रीन पटाखे चलाए जा सकते थे। महापौर सरदार राजा इकबाल सिंह ने कहा कि दिल्ली नगर निगम माननीय न्यायालय द्वारा जारी सभी निर्देशों को सख्ती और समयबद्ध तरीके से लागू करने के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा की सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय जनस्वास्थ्य की रक्षा करने और त्योहारों के दौरान प्रदूषण के बढ़ते स्तर को नियंत्रित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। दिल्ली नगर निगम नागरिकों के स्वास्थ्य और कल्याण को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक निर्देश को तत्परता और जिम्मेदारी के साथ लागू करने के लिए तैयार है।
- एनडीएमसी (NDMC) ने 54 स्थानों की सूची बनाई थी, जिनमें बाबा खड़ग सिंह मार्ग, पंत मार्ग, और अन्य प्रमुख स्थल शामिल थे।
- इन स्थलों में सार्वजनिक पार्क, सामुदायिक भवन, और खुले मैदान शामिल थे ताकि स्थानीय नागरिक सामूहिक रूप से और नियंत्रित वातावरण में उत्सव मना सकें।
बिक्री और निगरानी व्यवस्था
- पटाखों की बिक्री केवल निर्धारित लाइसेंसधारी विक्रेताओं को ही दी गई थी।
- जिला मजिस्ट्रेटों को जिम्मेदारी दी गई थी कि वे स्थानीय स्तर पर बिक्री स्थलों की पहचान करें और प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री पर रोक लगाएं।
- स्थानीय पुलिस और प्रशासन को निगरानी की जिम्मेदारी दी गई थी कि पटाखों का उपयोग केवल निर्धारित समय और स्थानों पर ही हो।
जनजागरूकता अभियान
- दिल्ली सरकार और नगर निगमों ने जनता को जागरूक करने के लिए अभियान चलाए।
- स्कूलों, सामुदायिक केंद्रों और सोशल मीडिया के माध्यम से ग्रीन पटाखों के लाभ और नियमों की जानकारी दी गई।
सामुदायिक भागीदारी का नया मॉडल
2018 की पहल ने यह दिखाया कि सामूहिक उत्सव और पर्यावरण की रक्षा साथ-साथ संभव है। पार्कों और सामुदायिक भवनों में संगठित आतिशबाज़ी ने न केवल प्रदूषण को नियंत्रित किया, बल्कि सामाजिक समरसता को भी बढ़ावा दिया।
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