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Motivation & Personality Development

शेर कभी हाथी जैसा नहीं बनना चाहता, इंसान को दूसरे जैसा ही क्यों बनना?

कौए को हंस की जिंदगी और लाइफस्टाइल ने इंप्रेस कर दिया। हंस से कहा भाई आपके जैसा बनना है। जहां भी बैठ जाता हूं लोग डंडा मारकर उड़ा देते हैं। मैं काला और आप सफेद। आप तो एक जगह बैठे रहकर इत्मीनान से भोजन भी पा जाते हो मुझे तो लोगों का जूठन खाना पड़ता है। हंस बोला यार विधवा के जैसा रहता हूं ये भी कोई रंग है। मैं तोते जैसा जीवन चाहता हूं। दोनों तोते के पास गए बोला आप बताओ सब मजे में कैसा जीवन चल रहा है तोते ने कहा खाक है मेरा जीवन मेरे रंग की वजह से लोग आम समझकर पत्थर मारे देते हैं कई बार मरते-मरते बचा। मैं तो मोर के जैसा बनना चाह रहा। अंतहीन है दूसरे जैसे जीवन का चुनाव। फिर सब पक्षी को ज्ञान हुआ तो अपना अपना जीवन जीने लगे।  

शेर को हाथी, हिरन को लोमड़ी और भेड़िए को सियार जैसा बिल्कुल भी नहीं बनना। हालांकि इंसान ज्यादातर की चाहता है टाटा, अंबानी और बिरला जैसी जिंदगी हो और फिर उसे जीने का ख्वाब हर पल बुनता है। कमबख्त पूरा होता नहीं और ऊपर से होती है परेशानी । ये सोचकर इंसान खुद के खुशी के कोटे को कम करता है परेशान रहता है। तो क्या सपने ना देखें, बिल्कुल देखिए लेकिन रिएलिटी वाले सपने। गला बेसुरा है लेकिन कुमार सानू बनना चाहते हैं तो फिर आपकी जिंदगी में हमेशा गलत स्वर ही बजता रहेगा। इसलिए जरूरी है पहले खुद का बनें। किसी और के जैसा दिखने, लगने और बनने की कोशिश कभी मत करो। अपनी हस्ती पर कायम रहो। सपनो की मायानगरी मुंबई के एक्टर ने कोरोना काल में खेती शूरू कर दी। न्यू नॉर्मल मान लिया और समय ठीक हुआ तो कमबैक कर लिया यही है असल जीवन जीने का तरीका। एक्टर अनिल कपूर कहते हैं हर 10 साल में वो एक्टिंग के तरीके को खुद ही बदलते है। सोचिए आखिरी बार आपने अपनी हस्ती को बनाए रखने के लिए क्या एक बदलाव लाया था?  हर हाल में अपनी हस्ती पर दबंगई से जमे रहना होगा। सुख-दुख में जब कभी दुख की पारी आए और काम में ब्रेक आ जाए तो अपनी स्किल मजबूत करने में लग जाओ और कॉमबैट मोमेंट मानकर कमबैक करो। आप मैदान में होंगे, तब गोल मार पाएंगे न। कभी देखा है रॉकेट आसमान में ऊपर जाते समय पीछे आग छोड़ता है। फूल में जब फल आने को होते हैं तो सारी पंखुड़ियां अपने से अलग कर देता है। ब्रेक बिखराव ना बने। बड़े लक्ष्य को हासिल करना है तो ब्रेक या छोटी-मोटी लड़ाई-झगड़ा या टकराव को बाय (Bye) कह दीजिए। टकराव में सिर्फ संघर्ष है। अनुभवों (Experience)  का बोझ कंधे पर रखकर नहीं बल्कि  घर की दहलीज के अंदर हो छोड़ दीजिएगा।

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