नॉमिनेटेड यानि नामित निगम पार्षद की संख्या निगम में 10 है। ये वो अनुभवी लोग हैं जो सदन को एक्सपर्ट सलाह देते हैं लेकिन ना एरिया में विकास कर सकते और ना ही सदन में वोट कर सकते हैं। लेकिन अब ऐसा नही है। सदन में वोटिंग राइट को तो सुप्रीम कोर्ट ने मना किया है। हालांकि वार्ड कमेटी के चुनाव में इनकी वोटिंग पावर जारी रहेगी। साल 2022 में दिल्ली नगर निगम में आम आदमी पार्टी का शासन आते ही मेयर चुनने के वक्त काफी हंगामा हो गया क्योंकि एल्डरमैनों की तैनाती को आम आदमी पार्टी ने कोर्ट में चुनौती दे दी। पहले एल्डरमैनों के शपथ और बाद में सदन में वोटिंग राइट को लेकर हंगामा हो गया। ढ़ाई साल बाद सभी एल्डरमैनों ने हक की आवाज उठाई और नेता सदन के पास मांग लेकर गये कि उन्हें ना केवल चुने पार्षदों की तरह हेल्थ बेनीफिट या मेडिकल सुविधा और सदन में सवाल पूछने का मौका दिया जाए।

गुरूवार को सदन में प्रस्ताव पास हो गया कि चुने एल्डरमैन कॉर्पोरेशन की मीटिंग में भाग लेकर चर्चा कर सकते हैं, अपना एक्सपर्ट ऑपिनियन दे सकते हैं लेकिन निगम की मीटिंग में वोट देने का अधिकार नहीं है। कमेटियों में इनकी वोटिंग पावर जारी रहेगी। खास बात है के अब तक चुने हुए प्रतिनिधियों की तरह किसी मद में एल्डरमैन को फंड का प्रावधान नही है। पास प्रस्ताव में अब ये तय हो गया कि दिल्ली नगर निगम एल्डरमैनों को भी फंड दिया जाना चाहिए ताकि चुने हुए प्रतिनिधियों की तरह वो एरिया का विकास कर सकें हालांकि वो एमसीडी के किसी भी वार्ड में फंड खर्च कर सकेंगे। ये प्रस्ताव प्रीएम्बल के जरिए पेश हुए हैं।

सबसे खास बात ज्यादातर पार्षदों को भी नही पता वो ये है कि सदन में पार्षद कोई प्राइवेट बिल या प्रस्ताव
पटल पर रखे वो तब तक पारित नही होता जब तक प्रशासनिक तौर पर कमिश्नर Preamble
के रूप में सदन में नही रखते। यानि सभी नीति निर्धारण के मामले में जो निर्णय लेगा वही
माना जाता है। कमिश्नर की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है लिहाजा पावर सेंटर या फिर
कंट्रोलिंग सेंटर केंद्र ही है



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