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नया जांच आयोग करे आपातकाल की जांच-विधान सभा अध्यक्ष, विजेंद्र गुप्ता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महामंत्री दत्तात्रेय घोष बोले के सोशलिस्ट और सेकुलर शब्दों पर दिया गया बयान सियासी हलके में तापमान को बढ़ा चुका है।

वही दिल्ली विधानसभा परिसर में आपातकाल को लेकर हुई संगोष्ठी में
विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने
सवाल उठाया कि “आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन के माध्यम से संविधान में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द क्यों जोड़े गए? संविधान जैसे दस्तावेज़ में इतने बुनियादी परिवर्तन किसी राष्ट्रीय बहस और सहमति के बिना नहीं किए जा सकते। हर सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आपातकाल से मिली सीख को जीवित रखे और संविधान की पवित्रता को कभी भी कमजोर न होने दे। ”

विजेंद्र गुप्ता ने कहा, “आपातकाल के बाद जो जांच शुरू हुई, वह अभी अधूरी है। शाह आयोग की रिपोर्ट (1978) समस्त मानवाधिकार उल्लंघनों और प्रशासनिक अतिक्रमणों की व्यापक जांच नहीं कर सकी। अब समय आ गया है कि एक नया आयोग गठित कर आपातकाल के दौरान और बाद में हुए दमन और अत्याचारों की विस्तृत जांच कराई जाए।”

केंद्रीय मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि “आत्ममुग्धता, तानाशाही प्रवृत्ति, अवसरवाद, लोकतांत्रिक सोच की कमी और वंशवादी महत्वाकांक्षाएं – यही वे लक्षण थे, जिनके कारण 1975 में आपातकाल थोप दिया गया। दुर्भाग्यवश, ये प्रवृत्तियाँ आज भी हमारे राजनीतिक परिदृश्य में मौजूद हैं।”

“भारतीय लोकतंत्र और संविधान का सबसे अंधकारमय दौर: ना भूलें, ना क्षमा करें” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी का आयोजन #संविधानहत्यादिवस के अंतर्गत किया गया, जो आपातकाल (1975–77) की 50वीं वर्षगांठ को चिह्नित करता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि,“1975 से 1977 का संक्षिप्त लेकिन काला कालखंड भारत के हर नागरिक के जीवन को प्रभावित करने वाला था। मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सख्त सेंसरशिप थोप दी गई, और हजारों लोगों को बिना मुकदमा चलाए कैद कर लिया गया। शहरी विकास के नाम पर जबरन नसबंदी और बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की गई। 1976 में पारित 42वां संविधान संशोधन, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल पाँच से बढ़ाकर छह वर्ष कर दिया गया — जिसे बाद में 44वें संशोधन (1978) द्वारा वापस लिया गया।”

पूर्व केंद्रीय मंत्री  सत्यनारायण जटिया ने कहा, “संविधान की प्रस्तावना उसकी आत्मा है, जो यह स्पष्ट करती है कि यह संविधान ‘जनता द्वारा और जनता के लिए’ बना है। किसी एक नेता को यह अधिकार नहीं कि वह तानाशाही प्रवृत्तियों के चलते इसके मूल स्वरूप को बिगाड़े। दुर्भाग्यवश, तत्कालीन कांग्रेस ने वही प्रवृत्ति अपनाई जो एक समय ब्रिटिश राज की हुआ करती थी।”

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