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“शिक्षा क्रांति” के नाम पर सिर्फ विज्ञापन दिखा कर भ्रमित किया” ; 1700 निजी स्कूल आएंगे फीस नियंत्रण के दायरे में  -सूद

दिल्ली में 1700 निजी स्कूलों में  1973 के कानून की खामी से केवल  300 स्कूलों की फीस तय होती थी। लेकिन इस नए क़ानून से सभी निजी स्कूल फीस निर्धारण के दायरे में आ गए है।  नई प्रक्रिया के तहत अब समयसीमा भी तय कर दी गयी है जैसे 15 जुलाई तक समिति का फैसला, 30 जुलाई तक जिला स्तर पर निर्णय और सितंबर तक अंतिम निर्णय। अगर 45 दिन में भी फैसला नहीं होता, तो मामला अपीलीय समिति में जाएगा।

दिल्ली विधानसभा से पारित दिल्ली  स्कूल  शिक्षा (शुल्क निर्धारण एवम विनियमन में पारदर्शिता)- 2025 विधेयक पर विपक्ष ने विवाद खड़ा कर सवाल खड़े कर दिये वहीं विधेयक के समर्थन और विरोध में प्रदर्शन हुए। सत्ताधारी बीजेपी ने इस बिल को ऐतिहासिक बताया तो विपक्षी आम आदमी पार्टी ने कई सवाल खड़े किये। इधर, दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने जनकपुरी विधानसभा में अभिभावकों के साथ एक “पैरेंट्स टाउन हॉल” में 200 अभिभावकों से बिल से जुड़े कई पहलुओं पर जवाब दिये तो दिल्ली स्कूल शिक्षा (शुल्क निर्धारण एवं विनियमन में पारदर्शिता) विधेयक, 2025 के लाभों के बारे में मंत्री ने खुलकर बताया।

शिक्षा  बिल कैसे लागू किया गया? पेरेंट्स के क्या अधिकार है? पेरेंट्स ऐतिहासिक बदलाव का हिस्सा कैसे बन सकते हैं? और कई सवालों के जवाब मंत्री ने दे दिए। खबर ये भी है कि पेरेंट्स की आशंकाओं पर खुद मंत्री ने तय समय सीमा में सुलझाने का आदेश दिया। सूद ने कहा,  प्राइवेट स्कूल दिल्ली की जरूरत हैं, लेकिन फीस निर्धारण में पारदर्शिता और जवाबदेही भी अनिवार्य है।

विधानसभा  के मानसून सत्र में  ‘दिल्ली स्कूल शिक्षा (फीस निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) विधेयक 2025’ बहुमत से पारित हो गया है। यह बिल निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाकर फीस निर्धारण में पारदर्शिता, अभिभावकों की सशक्त भागीदारी और फीस वृद्धि पर वीटो पावर दे रहा है। प्रावधान के मुताबिक कोई भी स्कूल सरकार की बिना अनुमति  के फीस बढ़ाएगा तो उस पर 1 से 10 लाख रुपये का जुर्माना और अतिरिक्त वसूली की रकम न लौटाने पर दोगुना दंड भी देना होगा।  शिक्षा निदेशक को एसडीएम जैसी शक्तियां देकर सभी स्कूलों पर एक समान कार्रवाई का प्रावधान किया गया है।

मंत्री आशीष सूद ने कहा “पिछली  सरकारें  शिक्षा क्षेत्र में न तो कोई  पारदर्शिता ही  लाई और न ही  फीस नियंत्रण का कोई मजबूत तंत्र और कानून  ही बनाया गया था। जो अपने को शिक्षा क्रांति के जनक बताते थे उन्होंने सिर्फ शराब घोटाला ही किया।  हमारी सरकार ने अभिभावकों और कई शिक्षा विदों से  चर्चा कर यह बिल तैयार किया है, जो शिक्षा के व्यवसायीकरण को तो रोकेगा ही साथ ही  बच्चों के सपनों की रक्षा करेगा।”

उन्होंने पेरेंट्स को बताया की निजी स्कूलों की फीस तय करने की प्रक्रिया में अब माता-पिता और अन्य हितधारकों की सीधी भागीदारी  और भूमिका  होगी। जिससे फीस निर्धारण में न केवल पारदर्शिता आएगी बल्कि पेरेंट्स पर अनाप शनाप फीस का बोझ  भी नही पड़ेगा।

 उन्होंने कहा की यदि सरकारी स्कूलों में बेहतर कक्षाएँ, माहौल और सुविधाएँ होती तो कोई भी पेरेंट्स अपने बच्चे की  ₹10,000 मासिक फीस नहीं देता।  नए कानून में फीस तय करने के कई स्टेकहोल्डर होंगे जैसे  अभिभावक, छात्र, शिक्षक, गैर-शैक्षिक स्टाफ और स्कूल प्रबंधन और सरकार की प्रतिनिधि।

सूद ने स्पष्ट किया की कि दिल्ली में 1700 निजी स्कूलों में  1973 के कानून की खामी से केवल  300 स्कूलों की फीस तय होती थी। लेकिन इस नए क़ानून से सभी निजी स्कूल फीस निर्धारण के दायरे में आ गए है।  नई प्रक्रिया के तहत अब समयसीमा भी तय कर दी गयी है जैसे 15 जुलाई तक समिति का फैसला, 30 जुलाई तक जिला स्तर पर निर्णय और सितंबर तक अंतिम निर्णय। अगर 45 दिन में भी फैसला नहीं होता, तो मामला अपीलीय समिति में जाएगा।

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