एक साधु नदी किनारे बैठा था। एक व्यक्ति आया और उस पर कीचड़ फेंक दिया। साधु ने आँखें बंद कर लीं और शांत रहा। शिष्य ने पूछा – “गुरुदेव, आपने प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी?” साधु मुस्कुराया – “पहली गलती उसने कीचड़ फेंककर की। दूसरी गलती मैं करता अगर उसे पकड़कर अपने भीतर रख लेता। मैंने उसका प्रभाव वहीं छोड़ दिया।”
ज़रा सोचिए एक नई गाड़ी खरीदने की खुशी कैसे वक्त के साथ कमतर होती जाती है। किसी ने आपको बरसों पहले कुछ चुभने वाला बोला था जबकि वो आज हर रोज़ आपको चुभाती है और परेशान करती है। गाड़ी वाली भावना तो भौतिक है तो वक्त के साथ खत्म होती जाती है लेकिन चुभने वाली भावना भौतिक नहीं बल्कि इमोशनल है जो घटने के बजाय हर रोज़ बढ़ती जाती है।
एक ट्रिक है चुभने वाली बात जिस दिन सुने ऊपर कहानी में साधू के प्रतिक्रिया न देने के तरह आपने वहीं छोड़ दिया तो फिर आप इमोशनल भावना को वहीं किल कर देते हैं। आप अप्रभावित होना शुरू करिए। देखिए फिर क्या कमाल होता है। हमने बुरे प्रभावों को पकड़े रखा तो फिर बरसों बरस इकट्ठा होकर आपको चुभता रहेगा। अच्छी-बुरी दोनों बातों से आपका नेचर बनता है। स्वभाव बनता है। हमी हैं तो बुरे प्रभावों को छोड़ते नही पकड़ते हैं उनकी ही परतें इकट्ठी होती चली जाती हैं।
सोच से मन बनता है, स्वभाव से पहचान, और व्यवहार से रिश्ते। दुनिया हमारे आचरण को देखकर ही हमें अपनाती है या दूर जाती है। इसलिए स्वभाव कठिन हो तो भी व्यवहार को सरल और सकारात्मक बनाइए।
लाखों की गाड़ी एक चाबी और ब्रेक पर टिकी है, करोड़ों का घर एक छोटे से ताले पर। उसी तरह हमारा व्यक्तित्व भी हमारी सोच और स्वभाव पर निर्भर करता है। सोच मन है, व्यवहार कर्म है। स्वभाव पहचान बनाता है, पर व्यवहार ही दुनिया को जोड़ता या तोड़ता है। स्वभाव बदलना कठिन है, लेकिन व्यवहार में परिवर्तन हमें नई दिशा दे सकता है

