“आपने जरूर सुना होगा–मेरे बारे में कोई राय कायम मत करना- मेरा वक्त बदलेगा, तुम्हारी राय बदलेगी” जी हां, आपने ठीक पढ़ा। तो क्या इंसान का वक्त खराब तो उसके बारे में सबकी राय खराब हो जाती है। ये कोई तय नियम नहीं लेकिन संसार में बहुत से लोगों की राय आपके खुद के वक्त और हालात पर तय करती है। इस उदाहरण से समझिए—
जीवन की उत्कृष्टता किसी और से तुलना करने में नहीं है, बल्कि खुद को परखने और सुधारने में है—साथ ही दूसरों के लिए शुभकामना रखने में। अपने आप पर विश्वास करें। आप अद्वितीय हैं और उत्कृष्ट हैं। जब यह समझ आ जाती है कि बाहरी दुनिया के लिए मैं “कोई हूँ” लेकिन अपने मन में “कोई नहीं हूँ,” तब कंधों का बोझ हल्का हो जाता है और सच्ची मुक्ति मिलती है। तब आप हल्के होते हैं और रॉकेट की तरह उड़ते हैं। बिल्कुल बेपरवाह। एक उदाहरण से समझिए—
रान्या ने 10 किलोमीटर की दूरी 1 घंटे में तय की।
राविका ने वही दूरी डेढ़ घंटे में पूरी की।
कौन तेज़ और स्वस्थ है?
पहली नज़र में जवाब होगा – रान्या।
लेकिन अगर पता चले कि रान्या ने यह दूरी तैयार ट्रैक पर तय की, जबकि राविका ने रेतीली ज़मीन पर चलकर पूरी की?
तो जवाब बदल जाएगा – राविका।
अब मान लीजिए रान्या की उम्र 50 साल है और राविका की 25 साल।
तो जवाब फिर बदलेगा – रान्या।
लेकिन अगर राविका का वज़न 140 किलो है और रान्या का 65 किलो?
तो जवाब फिर बदलेगा – राविका।
क्या सीखा आपने?
जैसे-जैसे हमें रान्या और राविका के बारे में अधिक संदर्भ मिलता है, हमारे निर्णय बदलते जाते हैं। यही जीवन की सच्चाई है। हम अक्सर बहुत सतही और जल्दीबाज़ी में राय बना लेते हैं, जिससे न तो खुद के साथ न्याय कर पाते हैं और न दूसरों के साथ।
- अवसर अलग-अलग होते हैं।
- जीवन-परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं।
- संसाधन अलग होते हैं।
- प्राथमिकताएँ बदलती रहती हैं।
- समस्याएँ और समाधान अलग-अलग होते हैं।
- और सबसे बढ़कर, कर्म भी अलग-अलग होते हैं।
—बस यहीं तक

