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ईनाम या इल्ज़ाम?… अफ़सरशाही का नया कारनामा

एमसीडी में अफ़सरशाही का खेल रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। चर्चा गर्म है कि एक असिस्टेंट कमिश्नर जो पहले से ही RP सेल (पार्किंग) का साम्राज्य संभाल रहे थे, अब एडवरटाइजमेंट विभाग का “एडिशनल चार्ज” भी ले बैठे हैं। सवाल ये है कि क्या एमसीडी में और कोई बचा ही नहीं जो ज़िम्मेदारी उठा सके, या फिर “कुर्सी पर वही बैठेगा जिसे खेल खेलना आता है?”

बीते दिनों इंद्रप्रस्थ विकास पार्टी ने पार्किंग माफ़िया और टॉप अफ़सर की मिलीभगत की पोल खोलने की कोशिश की थी। फाइनेंशल बिड खोलने की बजाय फाइलें दबाकर रखी गईं, और पार्षदों तक पर खौफ़ का माहौल बना दिया गया। यानी जिस पर आरोप है, उसी को ईनाम मिला। यह किस तरह का प्रशासनिक न्याय है?

पार्किंग से उगाही, अतिक्रमण और जैसी मनमानी वसूली — सबकी जानकारी इस अफ़सर को है। फिर भी कार्रवाई की जगह “एडिशनल चार्ज” थमा दिया गया। क्या अब एमसीडी में भ्रष्टाचार की प्रमोशन पॉलिसी लागू हो चुकी है?

एडवरटाइजमेंट विभाग ने पिछले कार्यकाल में 350 करोड़ का राजस्व दिया, लेकिन उसी विभाग को नया अधिकारी नहीं मिला। अब जब दो महीने से टेंडर तक नहीं खुले हैं, तो ये सवाल उठना लाज़मी है कि कहीं “रक्षक ही भक्षक” तो नहीं बन गया?

RP सेल (पार्किंग) की 2 छोटी मछलियां जुलाई से ट्रांसफर्ड हैं, बावजूद इसके कुर्सी पर डटी हैं। “K” तो खुलेआम ठेकेदारों से लेन-देन करता है और “G” फील्ड पार्किंग से वसूली। मतलब साफ़ है — ट्रांसफर सिर्फ़ कागज़ पर, असल में पोस्टिंग तो रुपयों की ताक़त तय करती है।

“मरघट वाले बाबा” पार्किंग स्थल पर बढ़ी हुई वसूली का कोई रिकॉर्ड एमसीडी के पास नहीं, लेकिन शहर भर में चर्चा है कि ये RP सेल के टॉप अधिकारी की ही शह में चल रहा है। और तो और, बचाव के लिए उसने पहले से ही सर्कुलर जारी कर दिया— “अगर पार्किंग में गड़बड़ी हुई तो AO और इंस्पेक्टर जिम्मेदार”। ये है बड़ा खेल! वाह! यानी मलाई ऊपर और ठोकरें नीचे।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या एडिशनल कमिश्नर को इन सबकी जानकारी नहीं है या जानकारी के बावजूद आंखें मूंद ली गई हैं?

क्या एमसीडी में पद और चार्ज अब मेरिट से नहीं, बल्कि “मैनेजमेंट” से मिलते हैं?

और आख़िर कब तक “मेमो और शो-कॉज़ नोटिस” के नाम पर अफ़सरशाही अपना वसूली साम्राज्य चलाती रहेगी?

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