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नेता प्रतिपक्ष के जिस पद पर राहुल गांधी वो संवैधानिक ही नहीं, जानिए कैसे?

संसद सत्र चल रहा है। तमाम मुद्दों पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सत्ता पक्ष से सवाल पूछ रहे। लेकिन, क्या आप जानते हैं राहुल गांधी जिस नेता प्रतिपक्ष के पद पर हैं वो दरअसल संवाधानिक है ही नहीं। आइए जानते हैं। कैसे?

क्या आप जानते हैं कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, स्पीकर, CAG जैसे संवैधानिक पदों का बाकायदा संविधान में उल्लेख मिलता है, लेकिन, भारतीय संविधान में “नेता प्रतिपक्ष” का कोई उल्लेख नहीं है। संवैधानिक पद वही होता है जिसका स्पष्ट उल्लेख संविधान में हो।  यह पद कानूनी/सांविधिक (statutory) है, जिसे The Salary and Allowances of Leaders of Opposition in Parliament Act, 1977 के माध्यम से मान्यता मिली है। नेता प्रतिपक्ष का उल्लेख संविधान में शामिल नहीं है, लिहाजा ये संवैधानिक पद नहीं है।

लोकसभा और राज्यसभा—दोनों में—सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को कुछ शर्तों के तहत Leader of Opposition माना जाता है।

नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए 10% वाली शर्त क्या है?

अब तक परंपरा रही है कि भारत में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) का दर्जा पाने के लिए विपक्षी दल के पास लोकसभा या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या का कम से कम 10% (यानी 1/10 हिस्सा) होना चाहिए। किसी दल के पास इतनी संख्या नहीं होती, तो उसके नेता को औपचारिक रूप से “नेता प्रतिपक्ष” का दर्जा नहीं दिया जाता।

10% नियम क्या है?

10% वाली शर्त कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं, बल्कि संसदीय परंपरा और स्पीकर की व्याख्या पर आधारित नियम है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि नेता प्रतिपक्ष वास्तव में एक मजबूत विपक्ष का प्रतिनिधित्व करे।

  • लोकसभा/विधानसभा की कुल सीटों का 10% विपक्षी दल के पास होना चाहिए।
  • जैसे: लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं। तो किसी दल को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा पाने के लिए कम से कम 55 सांसद चाहिए।

2. यह नियम कहाँ से आया?

  • भारतीय संसद में नेता प्रतिपक्ष का पद 1969 में औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त हुआ।
  • बाद में Salary and Allowances of Leaders of Opposition in Parliament Act, 1977 के तहत इस पद को कानूनी मान्यता मिली।
  • हालांकि, संविधान में “10% नियम” का सीधा उल्लेख नहीं है। यह एक संसदीय परंपरा और स्पीकर की व्याख्या से जुड़ा हुआ है।

3. विवाद और बहस

  • कई बार ऐसा हुआ है कि सबसे बड़ा विपक्षी दल 10% सीटें नहीं जुटा पाया।
  • उदाहरण: 2014 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पास केवल 44 सीटें थीं, जो 10% से कम थीं। इसलिए कांग्रेस नेता को औपचारिक रूप से नेता प्रतिपक्ष का दर्जा नहीं मिला।
  • इस पर बहस होती रही है कि क्या “सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता” ही नेता प्रतिपक्ष माना जाए, भले ही उसके पास 10% सीटें न हों।

4. महत्व

  • नेता प्रतिपक्ष को कैबिनेट मंत्री के बराबर दर्जा और वेतन-भत्ते मिलते हैं।
  • यह पद लोकतंत्र में बेहद अहम है क्योंकि यह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने और जवाबदेही तय करने का औपचारिक माध्यम है।

Source-AI

—ख़बर यहीं तक

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