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कोर्टरूम में गूँजी कविता: संपत्ति विवादों में रिश्तों की पुकार

दिल्ली की एक अदालत में सुनवाई के दौरान जज ने कविता पढ़कर यह संदेश दिया कि संपत्ति की लड़ाई अंततः रिश्तों को तोड़ देती है। पारिवारिक मिल्कियत के झगड़े ने न जाने कितने अफसाने बनाए हैं। भाई‑भाई अदालत में आमने‑सामने खड़े हैं, बहनें गवाही दे रही हैं और बुज़ुर्ग माता‑पिता सलाखों तक खिंच आए हैं। जज की कविता ने यह मिसाल दी कि अदालतें केवल कानून का पालन नहीं करातीं, बल्कि समाज को रिश्तों की अहमियत भी याद दिलाती हैं।

कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक जज द्वारा आदेश के रूप में पढ़ी गई कविता ने लोगों का दिल छू लिया।

मिल्कियत की जंग में न जाने कितने अफसाने हुए, कुछ ही अपने थे, वो भी अब बेगाने हुए। बनके कृष्ण, अब किसी को आना होगा, सड़ते, लड़ते, बिगड़ते रिश्तों को बचाना होगा। ना जाने ये जंग और कितनी महाभारत लाएगी, आखिर कितनों को सलाखों तक ले जाएगी।
बनकर बेटी, रिश्तों को बचाना होगा, सभी नातों को निभाना होगा। क्या रखा है इस जंग में कोई बताएगा, आखिर इस धरती से कौन क्या ही ले जाएगा?

ह लोगों को याद दिलाती है कि जंग से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि रिश्तों को निभाना ही असली जीत है। असली समाधान संवाद और समझदारी से आता है, न कि कोर्ट और सलाखों से। जीवन में “क्या ले जाएगा कोई”—यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि भौतिक चीज़ें अस्थायी हैं, रिश्ते ही स्थायी हैं।

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