कभी किसी ने कहा था — “दाल भात पावर 24 आवर”, लेकिन असली पावर तो संघर्ष से आती है। हर सफल व्यक्ति — चाहे टाटा हों, अंबानी, बिरला, सचिन या मोदी — उनके पीछे एक लंबा संघर्ष छिपा होता है। हम उनकी कहानी पढ़कर मोटिवेट तो होते हैं, लेकिन समय बीतने पर उसका असर खत्म हो जाता है। संघर्ष कोई समस्या नहीं, बल्कि वही असली ताकत है जो अवसरों के दरवाज़े खोलती है।
जिराफ अपने बच्चे को लात मारता है ताकि उसमें ताकत आए — यही जीवन का प्रतीक है। जब ज़िंदगी आपको जोर की लात मारे, समझ लीजिए बड़ा रिज़ल्ट आने वाला है। पत्रकारिता, नौकरी या किसी भी क्षेत्र में सफर मंज़िल नहीं, बल्कि लगातार चलने की प्रक्रिया है। जो संघर्ष को बोझ नहीं, सफर का मज़ा समझता है, वही आगे बढ़ता है।
तुलना हमेशा कमजोर करती है, लेकिन मोटिवेशन आगे बढ़ाता है। किसी और की ऊँचाई को अपनी शुरुआत से मत तोलिए — वरना आँसू ही मिलेंगे।
कई साल के एक्सपीरियंसड लोगों को पत्रकारिता में देखा लोग उसे काफी ख़ास मानते भी हैं। जबकी प्रैक्टिकल में महसूस हुआ कि ये एक बोझ है बस।
यह चलने का सफर है किसी मंजिल पर पहुंचने का नहीं मेहनत तो लगातार करनी ही पड़ती है।
एक खास टेंपलेट में कई सालों तक काम करते रहना और उसे एक्सपीरियंस का नाम देना बोझ ही कहा जायेगा. तो जीवन मैराथन है। सफर का मज़ा लीजिए जिसे संघर्ष दुगुना कर देता है। (हालांकि संघर्ष के बाद जब सफल होते हैं तभी महसूस होगा)
आप अपनी तुलना किसी से करेंगे। तो उसकी शुरुआत ही खुद को कमतर मानने से होती है। साफ है तुलना का विचार आपको पीछे करते है।
तुलना कमजोर करती है लेकिन मोटिवेशन आपको आगे बढ़ता है और हां, किसी खास शख्सियत के चरम की तुलना अपने सफर की शुरुआत या मध्य से मत कीजिए।
हमेशा रोना ही पड़ेगा। आँसू ही मिलेगा.

