एक गाँव में एक बूढ़ा बढ़ई था और उसका एक छोटा बेटा। एक दिन बढ़ई ने बेटे से कहा कि वह घर की सबसे नाज़ुक चीज़ संभाले—बेटा उसे प्यार से लेकर चला, पर एक दिन गलती से चीज़ टूट गई। बढ़ई ने गुस्से में नहीं डांटा; उसने बेटे का हाथ थामा और कहा, “तुम्हारा डर और कोशिश ही मेरे लिए मायने रखती है।” उस दिन बेटे ने समझा कि उनके बीच कोई कानूनी बंधन नहीं, भावनात्मक भरोसा है—और वही रिश्ता था जो टिक गया। मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स की कई खबर करने के दौरान दोनों देशों के बीच एग्रीमेंट, समझौता या फिर MOU ही पाया लेकिन वो तब तक ही टिके जब तक दोनों देशों का हित हल हुआ। बढ़ई और उसके बेटे के बीच कोई MOU तो हुआ नहीं फिर भी दूर तलक जाएगा।
रिश्ते में नियम नहीं, भावना काम करती है। याद रखिए आप के रिश्ते में दम होगा तो वो लंबा ऑटोमैटिक चलेगा। पॉजिटिव और नेगेटिव में ही संतुलन बनेगा। रिश्ते बराबरी से नहीं, बल्कि संतुलन से चलते हैं। रिश्ता बनाना बहुत आसान। निभाना उससे मुश्किल और चलाना इससे भी ज्यादा मुश्किल।
निभाने की ज़िम्मेदारी
रिश्ते खुद मरते नहीं; हम उन्हें अनदेखा करके या दबाकर ख़त्म कर देते हैं। रिश्ते बनाना आसान है, निभाना मुश्किल—और निभाने में ही रिश्ता ज़िंदा रहता है।

