ऑल इंडिया स्पीकर्स कांफ्रेंस में “भारत – मदर ऑफ डेमोक्रेसी” पर बोलते हुए राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने कहा कि “भारत की लोकतांत्रिक परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। ऋग्वेद से ही सभा और समिति जैसी सामूहिक विमर्श की संस्थाओं का उल्लेख मिलता है। रामायण और महाभारत में नेतृत्व का संबंध त्याग, नैतिकता और प्रजाजन के प्रति जिम्मेदारी से जोड़ा गया है। पश्चिमी चिंतकों ने राजनीति को नैतिकता से अलग किया, जबकि भारतीय चिंतन में धर्म और शासन हमेशा साथ रहे। उन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का हवाला देते हुए कहा कि “राजा का सुख प्रजा के सुख में है,” और इसे मैकियावेली के उस विचार से अलग बताया कि शासक के लिए भयभीत करना प्रिय होने से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
“भारतीय लोकतंत्र किसी अन्य देश से आयातित नहीं, बल्कि हमारी परंपराओं, महाकाव्यों और दार्शनिक विचारधारा में निहित है, जहाँ सदा धर्म और नैतिकता ने सत्ता का मार्गदर्शन किया।”
लोकतंत्र केवल ग्रंथों में ही नहीं बल्कि भारत के सामाजिक जीवन और संस्थानों में भी दृष्टिगोचर होता है – ग्राम पंचायतों, बौद्ध संघों, गणराज्यों से लेकर भक्ति और सूफी आंदोलनों तक। उन्होंने कहा कि गांधीजी स्वयं कहते थे “हम लोकतांत्रिक संस्कृति के लोग हैं” और डॉ. आंबेडकर ने “शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो” का आह्वान कर इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध कथन “लोक के लिए, लोक द्वारा, लोक की सरकार” को कौटिल्य के शाश्वत सूत्र से जोड़ा, जिसमें कहा गया है कि राजा का अस्तित्व प्रजा से अलग नहीं है।
परंपरा का आधुनिक रूप 1925 में तब सामने आया जब विट्ठलभाई पटेल केंद्रीय विधान सभा के पहले भारतीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए। इसने न केवल सरकार के उम्मीदवार को पराजित किया बल्कि अध्यक्ष पद की स्वतंत्रता और गरिमा की परंपरा स्थापित की। सिंह ने याद दिलाया कि यह सदन महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, पं. मोतीलाल नेहरू, महामना मालवीय जैसे नेताओं की आवाज़ों का साक्षी रहा है, जिनकी वाणी ने रोलेट एक्ट के विरुद्ध संघर्ष से लेकर असहयोग और सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों को जन्म दिया।
केंद्रीय विधान सभा के प्रथम भारतीय अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल के 1925 के निर्वाचन की शताब्दी के उपलक्ष्य में ये आयोजन था। दिल्ली विधानसभा में 24–25 अगस्त को आयोजित अखिल भारतीय अध्यक्ष सम्मेलन 2025 के प्रथम दिवस के द्वितीय सत्र को हरिवंश संबोधित करते वक्त ये बातें कहीं।

