रोज़ काम पर जाने वाले सोचते हैं कि एक दिन जब बढ़िया बैंक बैलेंस होगा तब खुश हो जाऊंगा। सुबह से शाम होती है और जिंदगी का सफर कब खत्म हो जाता है पता ही नहीं चलता। अक्सर लोग हम और आप यही सोचे हैं लाइफ सेटल हो जाए…रोज़ रोज़ की भागदौड़ से आराम मिले और लाइफ में स्थिरता मिल जाय तो समझिए सफल हो गये। लेकिन असलियत इससे बिल्कुल अलग है। हर सुबह जब हम उठते हैं, हर रोज़ कुआं खोदना पड़ता है। ट्रैकिंग की तरह हर रोज़ धरती से ऊपर नई चढ़ाई करनी पड़ती है। कभी खुद, परिवार और किसी रिश्तेदार के लिए। सुखी हैं तो दुखी भी होंगे। जैसे सूरज उगे या अस्बैत हो दानों ही समय उसकी लालिमा लाल ही होती है। बस हमें बैलेंस बनाना आना चाहिए। यही असली कला है।
एक छोटी कहानी से समझिए— सैंडी, जो 20 साल की उम्र में लोगों को इंप्रेस करने के लिए काम करता था, वही काम 40 की उम्र में नहीं कर सकता। वक्त बदलता है और उसके साथ बदलना ही तरक्की है। यही नेचर का रूल है। दुख की स्वीकृति ही उसके अंत की शुरुआत है और खुशी कोई बैंक बैलेंस नहीं, जिसे एक बार जमा कर दिया तो चलता रहे। खुशी रोज़ कमानी पड़ती है—जैसे रोज़ एक्सरसाइज करनी पड़ती है, रोज़ रिश्ते निभाने पड़ते हैं।
संदेश साफ है:
- जिंदगी uphill है, हर दिन नई चढ़ाई है।
- खुशी के लिए रोज़ काम करना पड़ता है।
- निंदा उन्हीं की होती है जो जिंदा होते हैं, मरने के बाद तो लोग तारीफ ही करते हैं।

